चाहते सब खो गयी है
ज़िन्दगी गुम हो गयी है ..
भर के जी देखू उसे
साज़ छेड़ने का मन,
चाँद को पाने की ख्वाहिश
भूल मुझसे हो गयी है ...
इस धरा का आसमां से
कब हुआ मिलना हकीकत
क्षितिज तो एक कल्पना है
काव्य - मन उपजी हुई है ...
बन नहीं पाए विहाग जो
पंख फैलाकर उड़े वो ,
भावनाएं उठ के फिर से
खाख ही सब हो रही है ...
मैं तो थी नदिया की भाँती
तुम अटल नग़ की तरह ,
चुप खड़े थे , सोचते थे
प्रीत पगली हो गयी है ...
............................
कण - कण मैं उसका अंश है
एक आत्मा ,एक ज्योति है
यही विधि विधान है
परमात्मा में खो रही है .......
फिर कहो कैसे वो ख्वाहिश
चाँद मेरा क्या हुआ
सब मिले जाकर उसी में
चाहते सब मिल रही है .....
22 jan,2008
क्षितिज=horizon,
विहग=पंछी ,
नग़ =mountain,
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Monday, June 28, 2010
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- bhawana
- अपने विचारों मैं उलझी किन राहों मैं नहीं भटकी खुद की तलाश में वक्त को बिताती हूँ पर जवाब नहीं पाती हूँ .... लोगों से मिलती हूँ ताल भी मिलाती हूँ अजनबी होने से थोडा खौफ खाती हूँ पर खुद को बहुत दूर बहुत दूर पाती हूँ ....