जाने कुछ कैसा होता है
हँसता है ना मन रोता है ..
चीज़ें रखकर भूल रहा मन
खुद को तब से ढूँढ रहा है ...
ना मालूम किधर छूटा था
तितली को मन पकड़ रहा था ...
वो तो गुम हो गयी आँख से
फिर भी मनवा ढूँढ रहा था ...
धरती और आकाश को नापा
फिर भी जाने कहा छुपा था..
मेरा मन था पगलाया सा
इसीलिए तो नहीं मिला था....
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Saturday, March 12, 2011
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- bhawana
- अपने विचारों मैं उलझी किन राहों मैं नहीं भटकी खुद की तलाश में वक्त को बिताती हूँ पर जवाब नहीं पाती हूँ .... लोगों से मिलती हूँ ताल भी मिलाती हूँ अजनबी होने से थोडा खौफ खाती हूँ पर खुद को बहुत दूर बहुत दूर पाती हूँ ....